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Friday, June 29, 2018

दुनिया देखने से पहले ही टूट रही जीवन की डोर, प्रतिवर्ष हो रही 450 की मौत

चूरू.

 

परिवार व रिश्तेदार नए मेहमान के आने की खुशी की तैयारी कर रहे थे। कइयों ने तो नन्हें का नाम भी सोच रखा था। दादी के साथ नानी भी सपने बुन रही थी। लेकिन सभी की उम्मीदों पर भगवान व कमजोर सरकारी तंत्र ने पानी फेर दिया। जिनसे परिवार व माता-पिता को जीवन की उम्मीदे थी, जिन्हे जीवन की किरण बनना था वह आंख खोलने के कुछ समय बाद ही सदा-सदा के लिए मौन हो गए। विज्ञान व आधुनिक चिकित्सा संसाधनों के इस युग में भी चूरू जिले में नवजातों की मौत नहीं रुक रही। अनेक चिकित्सक, गांव-गांव खुले आंगनबाड़ी केन्द्र, सहायिका, सहयोगिनियों के अलावा कथित एनजीओ की लम्बी चौड़ी फौज पर सरकार हर साल करोड़ों रुपए खर्च कर रही है, लेकिन इसके बाद भी प्रभावी अंकुश नहीं होने के कारण शिशुओं की मौत थमने का नाम नहीं ले रही। विभाग के आंकड़े बताते हैं कि मौत का यह आंकड़ा प्रतिवर्ष बढ़ता ही जा रहा है।

 

प्रतिमाह हो रही 43 से अधिक शिशुओं की मौत
जिले में बीते वर्ष में नवजातों की मौत में गत वर्षों की अपेक्षा इजाफा हुआ है। वर्ष 2017-18 में 526 शिशुओं ने दम तोड़ दिया, जो औसतन एक माह में 43.83 है। यानी जिले में प्रतिमाह 43 से अधिक माताओं की गोद सूनी हो रही है। मौत का बढ़ता यह दायरा सरकारी तंत्र के लिए चिंता का विषय है। ज्ञातव्य हो कि कुछ दर्जन शिशुओं की मौत चिकित्सा विभाग तक पहुंच भी नहीं पाती है जिसका कोई इंद्राज नहीं है। ऐसे मृत शिशुओं की संख्या भी एक या दो दर्जन से अधिक है।

 

क्या कहता है नीति आयोग
जानकारी के मुताबिक केन्द्र सरकार की ओर से गठित नीति आयोग ने शिशुओं की मौत के बारे में 2015-16 के रिफरेंस में बताया कि राजस्थान में एक माह के अंदर एक हजार पर 30 बच्चों की मौत हुई। इसी प्रकार एक साल की उम्र में प्रति हजार पर 41 व पांच वर्ष के अंदर प्रति हजार पर ५० बच्चों की मौत हुई।

 

नवजातों की मौत को कम करने के लिए कार्यक्रम
नवजातों की मौत को कम करने के लिए सरकार महिलाओं के गर्भधारण के समय से ही उनकी व भू्रण की देखरेख के लिए कार्यक्रम चला रही है। बीमार नवजातों के उपचार के लिए जिला अस्पतालों सहित कई सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों में गहन शिशु उपचार इकाइयां खोली गई हैं। एक साल तक के बच्चों के लिएनिशुल्क उपचार व एंबुलेंस की सुविधा है। जन्म के बाद नवजातों को मां का दूध पिलाने के लिए चूरू सहित प्रदेश में जगह-जगह मदर मिल्क बैंक स्थापित किए जा चुके हैं। कुपोषित बच्चों के उपचार के लिए कुपोषण निवारण केन्द्र भी खोले गएहैं। मिशन इन्द्रधनुष सहित तमाम तरह के टीके लगाए जा रहे हैं। विटामिन ए की खुराक दी जा रही है। ओआरएस व जिंक टैबलेट दिए जा रहे हैं। लेकिन जिले में प्रतिवर्ष नवजातों की मौत का बढ़ता आंकड़ा सरकार के उक्त कार्यक्रमों पर सवाल खड़ा कर रहा है।

 

जिला प्रजनन एवं शिशु स्वास्थ्य अधिकारी का दावा

जिला प्रजनन एवं शिशु स्वास्थ्य अधिकारी डा. सुनील जांदू का दावा है कि चूरू सहित राजस्थान में शिशु मृत्यु दर में कमी आई है। प्रदेश में पहले प्रतिवर्ष प्रति हजार पर 49 शिशुओं की मौत हो जाती थी लेकिन अब यह 40 तक आ गई है। हालांकि जिस गति से कमी होनी चाहिए थी उतनी नहीं हो पायी। वहीं जिले में मौत के जो आंकड़े बढ़ते दिख रहे हैं। उसका एक बड़ा कारण यह है कि मजबूत निगरानी और योजनाओं का ऑनलाइन होना है। इससे शिशुओं की मौत व जिंदा होने की पुख्ता जानकारी मिल जाती है। आने वाले समय में शिशुओं की मौत में और कमी आएगी।

 

शिशुओं की मौत में कमी लाने के लिए चिकित्सा विभाग की ओर से कई कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। जच्चा-बच्चा की सेहत के प्रति परिजनों को भी कुछ विशेष ध्यान देना होगा। समय से हर स्थिति की जांच करते रहे। आने वाले कुछ सालों में शिशुओं की मौत में कमी जरूर आएगी।
डा. मनोज शर्मा, मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी, चूरू



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